

दिनांक १६.०९.२०२१ विक्रम संवत २०७८ शाके १९४३ भाद्रपद, शुक्ल पक्ष, गुरुवासरे, दसमी तिथि तेजा दशमी का शुभ दिवस आपके लिए मंगलमय हो ::–
कहा जाता है कि इंसान जन्म से नहीं कर्म से महान होता है । राजस्थान के एक छोटे से गाँव खरनाल में जाट परिवार में जन्मे तेजकुंवर नाम के बालक ने अपनी कुशाग्र बुद्धि एंव पौरोष से परिवार तथा अपने मित्रो में अपनी अलग छवि बना ली थी, माता-पिता के संस्कार ऐसे थे कि कभी जूठ नहीं बोला । अपने प्राणों कि बलि देकर भी वह अपने वचनों को निभाने के लिए तैयार रहते थे । ईष्ट साधना एवं ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए युवा अवस्था में पदार्पण हुआ । जब उन्हे पता लगा की उनका विवाह बचपन में ही कर दिया गया था । अतःः वे माता-पिता की आज्ञा लेकर अपनी पत्नी को लेने ससुराल गये । जंहा उनकी मुलाकात अपनी साली लच्छा से हुआ । उसने बताया की उनकी गायों को डाकू जबरन घेर ले गये हैं । युवा जोषीले वीर तेजल को अत्याचार अनीति के विरूद्ध लडना था । सो वे साली लच्छा को वचन दिये की तुम्हारी गायों को डाकूओं से छूडाकर जरूर लाउंगा । जब वे गायों को डाकुओं से छुड़ाने जा रहे थे तब उनको रास्ते में एक नागराज जलते हुए दिखा। उसको बचाने के लिए उन्होंने अपने भाले से अलग कर दिया । इस पर नागराज क्रोधित हो गए । हे तेजल मेरी नागिन मर चुकी थी उसके साथ मै भी जल रहा था मै अपनी नागिन के बिना जिन्दा नहीं रह सकता स अब मै तुझे जिन्दा नहीं छोडूंगा । मै तुझे डसूंगा । तेजाजी बोले, है वासक मैने तो अपना धर्म निभाया है । मुझे नहीं मालूम था, नहीं तो मै तुझे कभी नहीं बचाता । पर नागराज जिद पर अड गये । इस पर तेजल ने कहा, हे वासक राजा मैंने अपनी साली को उसकी गाये डाकुओं से वापस लाने का वचन दिया है । मै लाछा को गाये दे कर फिर तेरे पास वापस आऊंगा तब मुझे डस लेना । नागराज बोला है तेजल कोई इंसान मौंत से बच कर, फिर मरने के लिए वापस आया हैे, किसी प्रकार तेजल ने वासक राजा को भरोसा दिलाते हुए कहा कि मैने जीवन में कभी झूठ नहीं बोला। मै वचन देता हॅूं कि मै वापस आऊंगा। नागराज बोले मै तेरा यहीं रास्ता देखूंगा । तेजाजी गायों को लेने डाकुओं के पास गए । जंहा उनका युद्ध डाकुओं से हुआ उन्होंने गायो को डाकुओं से छुड़ा लिया किन्तु वे लड़ाई के दौरान बुरी तरह घायल हो गए थे । उनके सारे शरीर से खून बह रहा था । एसी हालत में वे नागराज के पास गए और कहा, हे नागराज मैंने अपना वचन निभाया है तू मुझे डस ले । वासक राजा बोले- हे तेजल तेरा पूरा शारीर लहू लुहान हो रहा हैे मेरे डसने के लिए कोई स्थान है ही नहीं । तेजाजी ने कहा-हे नागराज मेरी जुबान कोरी है तू इसपे डस ले है। तब वासक राजा ने तेजाजी कि जुबान पर दंस भरा तथा वचन दिया आज के बाद जिस किसी व्यक्ति को सर्प दंस करता है और वह तेरे नाम कि ताती बंधेगा तो सर्प दंस का प्रभाव उस पर नहीं होगा । इस प्रकार मित्रो प्रत्येक वर्ष भादवे महीने में शुक्ल पक्ष कि दसमी तिथि को तेजा दसमी के रूप में मनाया जाता है । मित्रो यह भी सत्य हे कि किसी भी व्यक्ति को यदि सांप डस लिया है या पागल कुत्ते ने काट लिया हे तो सफेद या पंचरंगी नाडे में, ‘हे तेजाजी महाराज आपके नाम कि यह ताती कर रहा हूँ, मेरा काम सिद्ध करना ।” ऐसा बोलते हुए सात गठान लगा कर अगरबत्ती कि धुप देकर रोगी के हाथ या पांव जंहा भी जानवर ने काटा है बाँध दे । साथ ही डॉक्टरी ईलाज भी चलने दे । आप देखेंगे कि तेजाजी कि कृपा से रोगी को तुंरत आराम मिलने लगा है। जय तेजाजी महाराज, शुभ तेजा दसमी —–जय माता दी